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Monday, August 10, 2009

kartik mela ujjain2005/aAadil Rasheed

aadil rasheed kartik mela ujjain2005






























Thursday, July 23, 2009

रोटी की फ़िक्र ने उस रिक्शा थमा दिया भटका बहुत वो हाथ में डिग्री लिए हुए.... आदिल रशीद

हम यूँ खड़े हैं हाथ में तख्ती लिए हुए
लौटेगा अब वो बालों में चांदी लिए हुए

सोने का शौक़ थोड़े है सोते हैं इसलिए
आता है कोई ख्वाब में तितली लिए हुए

बचपन की छेड़छाड़ थी अब उसको भूल जा
बैठा है दिल में बात तू अब भी लिए हुए

रोटी की फ़िक्र ने उसे रिक्शा थमा दिया
भटका बहुत वो हाथ में डिग्री लिए हुए
आदिल रशीद 












Saturday, May 2, 2009

tasaaveer/aadil rasheed





Tasveer 1996/Aadil Rasheed

Tasveer1995/Aadil Rasheed

Tasveer 2005/Aadil Rasheed

Tasveer2005/Adil Rasheed

Tasveer2007/Aadil Rasheed


Tasveer1997/Aadil Rasheed


भूले भलके ही आशकी कर लो ......आदिल रशीद

गोशा ए दिल में रोशनी कर लो
भूले भटके ही आशकी कर लो

नफरतों से निकाल कर खुद को
मकतबे हुब की पैरवी कर लो

तंज़ रिश्तो का ख़ास दुश्मन है
छोड़ दो इसको शायरी कर लो

जेहन कहता है छोड़ दो उसको
दिल ये कहता है खुदकशी कर लो

हम ही हथियार डाल देते हैं
अब जो दिल चाहे तुम वही कर लो

कौन क्या है ये सब समझते हैं
बाते कितनी बड़ी बड़ी कर लो



meri teen betiyanaur beta hassan aadil rasheed/Aadil Rasheed



mashaba anam, arni sahar, zeba iram







Sunday, January 1, 2006

कम से कम इक दो मुखालिफ भी तो होने चाहिए सब को खुश रखने में तुम सब के बुरे हो जाओगे ..आदिल रशीद




मेरा और मेरी बेटी अर्नी सहर का जन्मदिन एक ही दिन २५ दिसम्बर को है जब हमारे एक ख़ास रिश्तेदार ने महज़ (केवल) किसी (मेरे मुखालिफ) को खुश करने के लिए उस दावत में शिरकत नहीं की तो मेरी बड़ी बेटी ज़ेबा इरम उदास हो गई और उसने मुझसे इसका कारण पूछा तो मैं ने उस मासूम को बताया के बेटा उनके पेट में दर्द था यूँ नहीं आये (मैं उस मासूम को इस उम्र में ये सब सियासत की बाते बताना नहीं चाहता था)
उस  समय यानि २५ दिसम्बर २००२  को  मुझे अपना ये शेर बहुत याद आया.
कम से कम  इक दो मुखालिफ भी तो होने चाहिए
सब को खुश रखने में तुम सब के बुरे हो जाओगे ..आदिल रशीद
کم سے کم اک دہ مخالف بھی تو ہونے چاہئے

سب کو خوش رکھنے میں تم سب کے بُرے ہو جاؤگے
عادل رشید